राष्ट्रीय खेलों में उत्तराखंड की बेटियों ने परिश्रम और संकल्प से हासिल की सफलता

उत्तराखंड की बेटियों ने राष्ट्रीय खेलों में अपनी अद्वितीय मेहनत और संकल्प से ना केवल अपनी राज्य की, बल्कि देशभर में अपनी पहचान बनाई है। जूडो और रेस वॉक में शानदार प्रदर्शन कर उन्नति शर्मा और शालिनी नेगी ने अपने खेलों के प्रति समर्पण और संघर्ष की मिसाल पेश की है।
उन्नति शर्मा ने जूडो में स्वर्ण पदक जीतकर दिखाया जज्बा
उत्तराखंड की बेटी उन्नति शर्मा ने जूडो में अपनी कड़ी मेहनत और अथक प्रयासों से राष्ट्रीय खेलों में स्वर्ण पदक जीता। उन्नति की कहानी एक प्रेरणा है, जिसने अपनी कठिनाइयों को पार कर राष्ट्रीय खेलों में गोल्ड जीता।
उन्नति की स्कूलिंग देहरादून के डीएवी पब्लिक स्कूल से हुई थी, जहां उसकी प्रतिभा को पहचाना गया। वह मात्र 11 साल की थी, जब उसके व्यायाम शिक्षक ने उसे जूडो खेल में रुचि लेने की सलाह दी। शुरुआत में तो वह सिर्फ एक शौक के तौर पर जूडो करती थी, लेकिन जैसे-जैसे उसने अपनी क्षमता को पहचाना, उसकी रुचि इस खेल में बढ़ती गई।
हालांकि, इस साल जनवरी में नई दिल्ली में हुई जूड़ो की सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में उन्नति को मध्य प्रदेश की हिमांशी टोकस से हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन उन्नति ने हार को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उसने इस हार को अपने संकल्प को मजबूत करने का एक कारण बनाया। यही कारण था कि जब वह राष्ट्रीय खेलों में जूडो के 63 किलोग्राम भार वर्ग के फाइनल में हिमांशी टोकस से फिर से टकराई, तो उसने अपनी हार का हिसाब बराबर कर लिया और स्वर्ण पदक जीतने में सफलता पाई। उन्नति के अनुसार, इस जीत ने उसे साबित कर दिया कि मेहनत और दृढ़ नायक के साथ संकल्प से कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता।
उन्नति ने बताया कि अब उसका अगला लक्ष्य अप्रैल में होने वाली एशियन चैंपियनशिप के लिए चयनित होना है, ताकि वह देश के लिए मेडल जीत सके।
शालिनी नेगी ने रेस वॉक में अपनी मेहनत से दिलाया रजत पदक
उत्तराखंड की बेटी शालिनी नेगी ने महिला वर्ग की 10 किलोमीटर रेस वॉक में उत्तराखंड को रजत पदक दिलाया और अपने संघर्ष की कहानी को सबके सामने रखा।
शालिनी का कहना है कि रेस वॉक में शुरुआत के समय लोग मजाक उड़ाते थे, क्योंकि उस समय इस खेल को बहुत लोग जानते नहीं थे। शालिनी चमोली जिले के सेकोट गांव की रहने वाली हैं और उन्होंने रेस वॉक की शुरुआत दो साल पहले गोपेश्वर स्पोर्ट्स स्टेडियम से की थी। शुरुआत में लोग उसे कहते थे कि रेस वॉक से कुछ नहीं होने वाला, इसलिए पढ़ाई पर ध्यान दो। शालिनी को इस प्रकार की टिप्पणियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
शालिनी बताती हैं कि उनके पांव में समस्या आने के कारण उनका प्रशिक्षण रुक गया था, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय अपनी समस्या से जूझते हुए फिर से प्रशिक्षण शुरू किया। इस दौरान उन्होंने तमिलनाडु में सेना के सूबेदार मेजर बसंत से भी प्रशिक्षण लिया, जिनकी मदद से उन्होंने अपनी तकनीक को और सुधार किया।
जब मंगलवार को महिला वर्ग की 10 किलोमीटर रेस वॉक में उनका मुकाबला हुआ, तो उनका लक्ष्य सिर्फ एक था – अपने माता-पिता को गर्व महसूस कराना। उनके माता-पिता ने इतनी दूर आकर उनका खेल देखा था, इसलिए उनका मनोबल बढ़ाना जरूरी था।
शालिनी ने इस रेस में न केवल रजत पदक जीता, बल्कि उन्होंने मणिपुर की वाई बाला देवी के वर्ष 2023 में बनाए गए 51 मिनट 56 सेकंड के रिकार्ड को भी तोड़ दिया। शालिनी ने रेस वॉक में 51 मिनट 10 सेकंड का समय लेकर यह रिकॉर्ड तोड़ा और अपनी कड़ी मेहनत का फल हासिल किया।
माता-पिता ने शालिनी की सफलता पर गर्व महसूस किया
शालिनी की माता सरला देवी और पिता ताजवर सिंह नेगी ने अपनी बेटी की सफलता पर गर्व महसूस किया। शालिनी के पिता सेकोट गांव में एक किसान हैं, और उनकी बेटी ने राज्य का नाम रोशन कर दिया है। शालिनी के माता-पिता ने कहा कि उनकी बेटी ने न केवल राज्य का गौरव बढ़ाया, बल्कि उन्होंने यह भी दिखाया कि जब संकल्प मजबूत हो, तो कोई भी बाधा उसे रोक नहीं सकती।
शालिनी ने अपनी सफलता का श्रेय अपने व्यायाम शिक्षक गोपाल बिष्ट को दिया, जिन्होंने शुरुआत में उसे रेस वॉक की तकनीक सिखाई और उसे प्रेरित किया।