Punjab

पंजाब कांग्रेस की राजनीति में नई हलचल, भूपेश बघेल के नेतृत्व में बैठक, नहीं पहुंचे नवजोत सिंह सिद्धू

पंजाब कांग्रेस के नए प्रभारी भूपेश बघेल ने गुरुवार (13 मार्च) को दिल्ली में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी की बैठक बुलाई, जिसमें संगठन के कामकाज और भविष्य की रणनीतियों पर चर्चा की गई। इस बैठक में पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राजा बराड़, पंजाब में नेता विपक्ष प्रताप सिंह बाजवा, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी समेत सभी वरिष्ठ नेता मौजूद थे, लेकिन एक नाम जो इस बैठक से नदारद था, वह था नवजोत सिंह सिद्धू का।

नवजोत सिंह सिद्धू, जो कि पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी के सदस्य हैं, बैठक में शामिल नहीं हुए। उनके इस अनुपस्थिति को लेकर राजनीति में नई चर्चाओं का जन्म हुआ है। सिद्धू ने लंबे समय से कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रमों और बैठकों से दूरी बनाई हुई है, और यह सवाल उठ रहा है कि क्या उन्होंने पार्टी छोड़ने का मन बना लिया है?

भूपेश बघेल का नेतृत्व और पार्टी की चुनौतियां

भूपेश बघेल, जो हाल ही में पंजाब कांग्रेस के प्रभारी नियुक्त हुए हैं, उनके सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के अंदर गुटबाजी और प्रदेश अध्यक्ष के पद को लेकर चल रही आपसी खींचतान को सुलझाना है। पंजाब कांग्रेस में हमेशा से ही आंतरिक विवाद रहे हैं, और अब जब भूपेश बघेल के नेतृत्व में नए बदलाव आ रहे हैं, तो उनके सामने यह सवाल है कि वे कैसे इन गुटबाजी और विवादों को सुलझाएंगे।

कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर चल रही असमंजस की स्थिति को देखते हुए यह संभावना जताई जा रही है कि पार्टी जल्द ही पंजाब कांग्रेस के नए अध्यक्ष का ऐलान कर सकती है। इस पद को लेकर कई नाम चर्चा में हैं, और इन नामों में सबसे प्रमुख नाम राजा बराड़, प्रताप सिंह बाजवा और कुछ अन्य वरिष्ठ नेताओं का है।

नवजोत सिंह सिद्धू: कांग्रेस में उनका भविष्य

नवजोत सिंह सिद्धू का इस बैठक से नदारद रहना न केवल पार्टी के भीतर उनके रिश्तों को लेकर सवाल खड़े कर रहा है, बल्कि यह संकेत भी दे रहा है कि सिद्धू के कांग्रेस में भविष्य पर भी संदेह पैदा हो सकता है। सिद्धू ने एक समय पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर अपनी भूमिका निभाई थी, लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान पार्टी में गुटबाजी और विवादों की कमी नहीं रही।

पंजाब विधानसभा चुनाव में अमृतसर ईस्ट से उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा था, जो उनके लिए एक बड़ा झटका था। इसके बाद सिद्धू ने पार्टी के कार्यक्रमों से दूरी बनानी शुरू कर दी, और अब उनका दिल्ली बैठक में न होना इस बात का इशारा करता है कि उनकी कांग्रेस से दूरी बढ़ रही है।

सिद्धू की सोशल मीडिया गतिविधियां

हालांकि सिद्धू समय-समय पर कांग्रेस के नेताओं से मुलाकात करते रहे हैं, खासकर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी से उनकी मुलाकातें चर्चा का विषय रही हैं। जनवरी में सिद्धू ने प्रियंका गांधी से मुलाकात की थी और उस मुलाकात की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर की थी। इसके अलावा, सिद्धू के एक्स प्रोफाइल (पूर्व में ट्विटर) पर उनकी कवर इमेज में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ एक तस्वीर लगी हुई है। यह इशारा करता है कि सिद्धू का संबंध पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से अब भी बना हुआ है, लेकिन उनके पार्टी के भीतर की सक्रियता में कमी आई है।

क्या कांग्रेस में सिद्धू का भविष्य खतरे में है?

नवजोत सिंह सिद्धू ने साल 2016 में बीजेपी से इस्तीफा दे दिया था और 2017 में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। कांग्रेस में शामिल होने के बाद सिद्धू ने पंजाब की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और अमृतसर ईस्ट से विधायक चुने गए थे। लेकिन, उनका कांग्रेस में राजनीतिक सफर उतना सहज नहीं रहा। पार्टी में गुटबाजी और आंतरिक विवादों के कारण सिद्धू का राजनीतिक भविष्य हमेशा सवालों के घेरे में रहा है।

उनकी विधानसभा चुनाव में मिली हार ने उनकी छवि को भी नुकसान पहुंचाया, और इसके बाद से ही सिद्धू का पार्टी से जुड़ाव कमजोर हुआ। यह कहा जा सकता है कि सिद्धू के लिए कांग्रेस में अपनी भूमिका को पुनः स्थापित करना मुश्किल हो सकता है, खासकर तब जब पार्टी के भीतर नेतृत्व और गुटबाजी की समस्याएं चल रही हों।

भूपेश बघेल के सामने क्या चुनौतियां हैं?

पंजाब कांग्रेस के प्रभारी के रूप में भूपेश बघेल के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर फैली गुटबाजी और विवादों को सुलझाना है। पार्टी के भीतर प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर कई वरिष्ठ नेताओं के बीच खींचतान जारी है और भूपेश बघेल को इसे सुलझाने का जिम्मा सौंपा गया है।

हालांकि भूपेश बघेल को कांग्रेस के भीतर एक अनुभवी और समझदार नेता माना जाता है, लेकिन पंजाब में कांग्रेस के भीतर गहरी राजनीति और आंतरिक खींचतान उन्हें कठिन रास्ते पर ले जा सकती है। बघेल के लिए यह भी जरूरी होगा कि वे पार्टी के भीतर एकता की भावना को बढ़ाएं और नेतृत्व के मुद्दे पर कोई ऐसा समाधान ढूंढ़े जो सभी गुटों को स्वीकार्य हो।

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