रेप पर इलाहबाद HC की टिप्पणी से भड़के कपिल सिब्बल ,कानून विशेषज्ञों का तीखा विरोध

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा हाल ही में यौन अपराध से जुड़े एक मामले में की गई टिप्पणी ने कानून विशेषज्ञों और न्यायिक दृष्टिकोण से जुड़ी विभिन्न हस्तियों को हैरान कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि किसी लड़की के निजी अंग को पकड़ना और उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना दुष्कर्म या दुष्कर्म के प्रयास का मामला नहीं माना जा सकता। यह टिप्पणी, विशेष रूप से एक जघन्य अपराध के मामले में, पूरे न्यायिक और कानूनी समुदाय के बीच विवाद का कारण बन गई है।
कानून विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इस फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार की टिप्पणी समाज में गलत संदेश भेजती है और इससे न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है। इस विवादित फैसले को लेकर एक बार फिर न्यायपालिका की संवेदनशीलता और सामाजिक न्याय के महत्व पर सवाल उठ रहे हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का विवादास्पद फैसला
मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज का है, जहां 2021 में दो लोगों ने 11 साल की एक लड़की से हमला किया था। इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने फैसला सुनाया कि केवल लड़की के निजी अंगों को पकड़ना और उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के अपराध को किसी महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला करने या आपराधिक बल प्रयोग के दायरे में रखा जा सकता है, लेकिन इसे बलात्कार के प्रयास के रूप में नहीं माना जा सकता।
कोर्ट के इस फैसले के बाद, कानून विशेषज्ञों और समाजसेवियों ने इसे बेहद निराशाजनक और खतरनाक माना है। उनका मानना है कि इस फैसले से समाज में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हो रहे यौन अपराधों को कमतर करके आंका जाएगा, जो गलत है और न्याय की प्रक्रिया का अपमान है।
कपिल सिब्बल और अन्य विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
सीनियर एडवोकेट और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कपिल सिब्बल ने इस फैसले की आलोचना करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “भगवान ही इस देश को बचाए, क्योंकि पीठ में इस तरह के न्यायाधीश विराजमान हैं! सुप्रीम कोर्ट गलती करने वाले जजों से निपटने के मामले में बहुत नरम रहा है।” कपिल सिब्बल ने यह भी कहा कि न्यायाधीशों को ऐसी टिप्पणियां करने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे समाज में गलत संदेश जाता है और न्यायपालिका पर से लोगों का भरोसा उठ सकता है।
सीनियर एडवोकेट पिंकी आनंद ने कहा कि यह फैसला बलात्कार के प्रयास जैसे जघन्य अपराध को कमतर करके आंका गया है। उन्होंने पीटीआई-भाषा से बात करते हुए कहा, “लड़की के निजी अंगों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसे घसीटकर पुलिया के नीचे ले जाने की कोशिश करना और सिर्फ हस्तक्षेप के बाद ही भागने जैसे तथ्यों के मद्देनजर यह मामला पूरी तरह से बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में आता है, जिसमें 11 साल की लड़की के साथ बलात्कार की मंशा से हर संभव हरकत की गई।”
पिंकी आनंद ने इस फैसले को “न्याय का उपहास” करार दिया और कहा कि यह समय है कि न्यायपालिका इस तरह के फैसलों के खिलाफ कदम उठाए। उनका मानना था कि कानून का उल्लंघन करने वालों और महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध करने वालों को बख्शा नहीं जा सकता।
सौरभ पाहवा और पीके दुबे का दृष्टिकोण
सीनियर एडवोकेट विकास पाहवा ने भी इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा, “इलाहाबाद हाईकोर्ट की व्याख्या, बलात्कार के प्रयास की संकीर्ण परिभाषा देकर एक चिंताजनक मिसाल कायम करती प्रतीत होती है।” उन्होंने कहा कि इस तरह के फैसलों से यौन हिंसा के पीड़ितों की सुरक्षा के प्रति न्यायिक प्रणाली की प्रतिबद्धता में जनता का विश्वास कम हो सकता है। विकास पाहवा ने यह भी कहा कि इस प्रकार के फैसले पीड़ितों को आगे आने से हतोत्साहित कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें डर होगा कि उनके साथ हुई हरकतों को कमतर आंका जाएगा या खारिज कर दिया जाएगा।
विकास पाहवा ने कहा, “यह जरूरी है कि न्यायपालिका अधिक पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाए और यह सुनिश्चित करे कि दुष्कर्म की मंशा दर्शाने वाली हरकतों को उचित रूप से पहचाना जाए और उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जाए, ताकि न्याय प्रणाली में लोगों का विश्वास बना रहे और संभावित अपराधियों पर लगाम लगाई जा सके।”
वरिष्ठ अधिवक्ता पीके दुबे ने भी विकास पाहवा की राय से सहमति जताई। उन्होंने कहा, “न्यायाधीश के निजी विचारों के लिए कोई जगह नहीं है और उन्हें स्थापित कानून और न्यायशास्त्र का पालन करना चाहिए।” पीके दुबे का मानना था कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में यह देखना जरूरी है कि क्या किसी भी रूप में यौन मंशा जाहिर हुई है और क्या पीड़ित को किसी प्रकार की चोट पहुंची है।
न्यायिक प्रक्रिया और अदालत का अधिकार
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो सकते हैं, क्योंकि इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समन जारी करने के पहले ही मामले की गहराई से समीक्षा की और अपराध की प्रकृति का पुनर्मूल्यांकन किया। यह सामान्य प्रक्रिया नहीं है, क्योंकि अदालतें आमतौर पर सबूतों के विश्लेषण पर गहराई से विचार किए बिना यह आकलन करती हैं कि आरोपों के आधार पर प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं।
महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों की गंभीरता
कानून विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यौन अपराधों से संबंधित मामलों में अदालतों को अधिक संवेदनशील और गंभीर रुख अपनाना चाहिए। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि यह समाज के लिए एक बड़ा खतरा है। इस तरह के फैसले समाज में यह संदेश भेज सकते हैं कि यौन अपराधों को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता, जितनी कि आवश्यकता है। इससे पीड़ितों को न्याय मिलने में कठिनाई हो सकती है, और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय उन्हें बचने का अवसर मिल सकता है।