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PUNJAB के नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने जनसंख्या आधारित परिसीमन पर चर्चा की अपील की

पंजाब के नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने सभी राजनीतिक पार्टियों से अपील की है कि वे जनसंख्या आधारित परिसीमन (population-based delimitation) के मुद्दे पर गहन चर्चा करें। उन्होंने कहा कि यदि आवश्यक हो, तो इसका विरोध भी किया जाना चाहिए। बाजवा की यह टिप्पणी कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी के बयान के बाद आई है, जिन्होंने पहले इस मुद्दे को उठाया था। दोनों नेताओं ने जनसंख्या आधारित परिसीमन के प्रभाव को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है, खासकर पंजाब जैसे राज्यों की राजनीतिक और प्रतिनिधित्व की स्थिति पर पड़ने वाले असर को लेकर।

क्या है जनसंख्या आधारित परिसीमन?

जनसंख्या आधारित परिसीमन का मतलब है कि संसदीय क्षेत्रों या विधानसभा सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाए। इसके तहत, जनसंख्या के हिसाब से राज्यों को लोकसभा और राज्यसभा की सीटों का वितरण होता है। इस विधि के अंतर्गत, जिन राज्यों में जनसंख्या अधिक होगी, वहां सीटों की संख्या बढ़ेगी, जबकि जिन राज्यों में जनसंख्या कम होगी, वहां सीटें कम हो सकती हैं। इस तरह के परिसीमन में राज्य की जनसंख्या का सीधा प्रभाव होता है, जिससे राजनीतिक संतुलन में बदलाव आ सकता है।

बाजवा की चिंता: पंजाब की हिस्सेदारी हो सकती है सीमांत

पंजाब में जनसंख्या आधारित परिसीमन लागू करने पर नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने चिंता जताते हुए कहा कि यदि लोकसभा की सीटों की संख्या 848 हो जाती है, तो पंजाब जैसे छोटे राज्यों की हिस्सेदारी सीमांत हो जाएगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे जनसंख्या बहुल राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी, जबकि पंजाब की स्थिति इन राज्यों के मुकाबले कमजोर हो जाएगी। बाजवा ने यह भी कहा कि इन राज्यों में पहले ही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अच्छी स्थिति में है, और अगर परिसीमन के बाद इन राज्यों की सीटों में वृद्धि होती है, तो पंजाब की राजनीतिक स्थिति और भी कमजोर हो सकती है।

मनीष तिवारी की चिंता: ‘एक नागरिक, एक वोट’ सिद्धांत से उत्तरी राज्यों का नुकसान

इससे पहले, कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी जनसंख्या आधारित परिसीमन पर अपनी चिंता व्यक्त की थी। उनका कहना था कि यदि परिसीमन ‘एक नागरिक, एक वोट’ और ‘एक मूल्य’ के सिद्धांत के आधार पर किया जाता है, तो यह उत्तरी राज्यों के लिए नुकसानदायक होगा। मनीष तिवारी ने बताया कि लोकसभा और राज्यसभा की कुल ताकत में उत्तरी राज्यों का प्रतिशत घट जाएगा, जिससे इन राज्यों का राजनीतिक प्रभाव कम हो जाएगा। उन्होंने कहा कि यह नीति विशेष रूप से पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों के लिए प्रतिकूल साबित हो सकती है।

पंजाब और हरियाणा की स्थिति में बदलाव: लोकसभा सीटों की संख्या में कमी

मनीष तिवारी ने यह भी कहा कि जनसंख्या आधारित परिसीमन के तहत पंजाब की लोकसभा सीटों की संख्या 13 से बढ़कर 18 हो सकती है, लेकिन यह बढ़ोतरी भी सीमित होगी और पंजाब की वर्तमान राजनीतिक स्थिति को बदलने में ज्यादा असरदार नहीं होगी। इसके बजाय, हरियाणा जैसे राज्य में, जहां जनसंख्या बढ़ रही है, पंजाब के मुकाबले सीटों की संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है। मनीष तिवारी ने चेतावनी दी कि इस बदलाव से हरियाणा और पंजाब के बीच विवाद और तनाव बढ़ सकता है।

उन्होंने कहा कि हरियाणा में वर्तमान में 10 लोकसभा सीटें हैं और पंजाब में 13, जबकि हरियाणा की जनसंख्या पंजाब से अधिक है, खासकर एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) से पलायन के कारण। अगर जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ तो हरियाणा की सीटों में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे पंजाब के अधिकारों पर असर पड़ेगा।

पंजाब और हरियाणा के बीच बढ़ेगा तनाव

मनीष तिवारी का मानना है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन के लागू होने के बाद पंजाब और हरियाणा के बीच तनाव बढ़ सकता है। हरियाणा और पंजाब दोनों राज्य निकटवर्ती हैं और उनकी राजनीति भी आपस में जुड़ी हुई है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पंजाब हरियाणा के साथ समान लोकसभा सीटों की संख्या स्वीकार करेगा? इस मुद्दे पर तनाव बढ़ सकता है और दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक विवाद खड़ा हो सकता है। तिवारी ने सरकार से एक नया फॉर्मूला पेश करने की मांग की, ताकि दोनों राज्यों के बीच मतभेद कम किए जा सकें।

क्या समाधान हो सकता है?

बाजवा और तिवारी दोनों ने इस मुद्दे पर एकजुट होकर चर्चा करने की अपील की है। उनका कहना है कि सभी राजनीतिक दलों को जनसंख्या आधारित परिसीमन के फायदे और नुकसान पर गंभीर चर्चा करनी चाहिए। इस चर्चा के दौरान यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी राज्य का अधिकार नहीं छीना जाए और हर राज्य को समान प्रतिनिधित्व मिले। उनका कहना था कि अगर इस पर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया, तो पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य राजनीतिक दृष्टि से हाशिए पर जा सकते हैं।

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