अमेरिका ने भारत को दिया बड़ा झटका, 2 अप्रैल से लागू होगा रेसिप्रोकल टैरिफ नीति

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को अपने एक घंटे 44 मिनट के भाषण में भारत को एक बड़ा झटका देते हुए कहा कि अमेरिका अगले महीने से भारतीय उत्पादों पर रेसिप्रोकल टैरिफ नीति लागू करेगा। ट्रम्प ने अमेरिकी संसद के जॉइंट सेशन को संबोधित करते हुए कहा कि भारत अमेरिका से 100 फीसदी से ज्यादा टैरिफ वसूलता है, और अब अमेरिकी सरकार भी 2 अप्रैल से ऐसा ही करने जा रही है। उनका यह बयान अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक संबंधों में नई मुश्किलें पैदा करने वाला हो सकता है।
ट्रंप का यह बयान उनके प्रशासन द्वारा भारत पर लगाए जाने वाले व्यापार प्रतिबंधों की ओर एक और कदम था। उन्होंने कहा कि उन्होंने सिर्फ 43 दिन में वह हासिल किया है, जो कई सरकारें अपने 4 या 8 साल के कार्यकाल में नहीं कर पाई थीं। इस कदम के पीछे उनका उद्देश्य भारत के साथ व्यापार में संतुलन लाना है, लेकिन इस फैसले से भारत और अमेरिका के रिश्तों पर दूरगामी असर पड़ सकता है।
रेसिप्रोकल टैरिफ क्या होता है?
रेसिप्रोकल का मतलब होता है ‘प्रतिशोधात्मक’ यानी जैसा तुम करोगे, वैसा मैं करूंगा। इसे सरल भाषा में समझें तो रेसिप्रोकल टैरिफ वह नीति है, जिसमें एक देश दूसरे देश के सामान पर उसी प्रकार का टैक्स या व्यापार प्रतिबंध लगाता है, जो पहले देश ने उसके सामान पर लगाया हो। उदाहरण के तौर पर, यदि भारत अमेरिका से आयातित वस्त्रों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाता है, तो अमेरिका भी भारत से आयातित वस्त्रों पर वही 100 फीसदी टैक्स लगा सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य व्यापार में संतुलन बनाना और दोनों देशों के बीच एक निष्पक्ष व्यापारिक वातावरण सुनिश्चित करना है।
रेसिप्रोकल टैरिफ का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दोनों देश एक-दूसरे पर समान शुल्क और टैक्स लगाए, ताकि कोई भी देश दूसरे देश के उत्पादों पर अत्यधिक शुल्क न लगा सके। यह नीति व्यापारिक असंतुलन को सुधारने की कोशिश करती है और व्यापार को पारदर्शी बनाती है।
रेसिप्रोकल टैरिफ का उद्देश्य
- व्यापार संतुलन: रेसिप्रोकल टैरिफ का प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक असंतुलन न हो। यह नीति सुनिश्चित करती है कि यदि एक देश किसी दूसरे देश के उत्पादों पर उच्च टैक्स या शुल्क लगाता है, तो दूसरा देश भी उसी पैमाने पर शुल्क लगा सकता है।
- स्थानीय उद्योगों की सुरक्षा: जब एक देश विदेशी उत्पादों पर उच्च टैरिफ लगाता है, तो यह स्थानीय उद्योगों को सुरक्षा प्रदान करता है। महंगे विदेशी सामान के कारण लोग घरेलू उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिलता है।
- व्यापार वार्ता का हिस्सा: रेसिप्रोकल टैरिफ को कभी-कभी व्यापार वार्ता के हिस्से के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य दूसरे देश को प्रोत्साहित करना होता है ताकि वह अपने व्यापारिक शुल्क कम करे और व्यापारिक संतुलन बनाए रखे।
रेसिप्रोकल टैरिफ के नुकसान
- व्यापार युद्ध (ट्रेड वॉर): यदि दोनों देश एक-दूसरे पर टैरिफ लगाते रहते हैं, तो यह स्थिति व्यापार युद्ध का रूप ले सकती है। व्यापार युद्ध से वैश्विक व्यापार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है और यह दोनों देशों के आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकता है।
- महंगाई: जब विदेशी सामान पर टैरिफ बढ़ा दिया जाता है, तो इन सामानों के दाम बढ़ जाते हैं। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ता है, क्योंकि उन्हें महंगे उत्पादों का सामना करना पड़ता है।
- आपूर्ति श्रृंखला में बाधा: व्यापार युद्ध से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। कई कंपनियां अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर होती हैं, और व्यापारिक प्रतिबंधों के कारण इन कंपनियों को अपने उत्पादन और आपूर्ति प्रक्रियाओं में बदलाव करना पड़ सकता है।
रेसिप्रोकल टैरिफ का इतिहास
रेसिप्रोकल टैरिफ की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य में हुई थी। 1860 में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच कोबडेन-शेवेलियर संधि हुई थी, जिसके अंतर्गत दोनों देशों ने अपने-अपने टैरिफ को कम किया। इस संधि ने दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा दिया और वैश्विक व्यापार को भी नया दिशा दिया।
1930 के दशक में, अमेरिका ने स्मूट-हॉले टैरिफ एक्ट लागू किया था, जिसका उद्देश्य अमेरिकी उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना था। हालांकि, इस फैसले का वैश्विक व्यापार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा, जिससे महामंदी की स्थिति उत्पन्न हुई।
हाल के वर्षों में, डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने चीन, यूरोपीय संघ और अन्य देशों पर टैरिफ लगाए, जिसके जवाब में इन देशों ने भी अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ लगाए। इससे वैश्विक व्यापार में असंतुलन और व्यापार युद्ध जैसी स्थितियां उत्पन्न हुईं।
ट्रम्प का भारत के साथ व्यापारिक संघर्ष
डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से रेसिप्रोकल टैरिफ नीति लागू करने की घोषणा एक ऐसी कार्रवाई है जो भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संघर्ष को और बढ़ा सकती है। भारत अमेरिका का प्रमुख व्यापारिक साझीदार है, और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों का लंबा इतिहास रहा है। हालांकि, ट्रम्प का यह कदम भारतीय उत्पादों पर ज्यादा शुल्क लगाने की योजना का हिस्सा है, जिससे भारत की निर्यात में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
भारत की प्रतिक्रिया इस फैसले पर महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि भारत भी व्यापारिक प्रतिबंधों के मामले में अपनी नीतियों का पालन कर सकता है। इसके अलावा, व्यापारिक विवादों का समाधान किसी समझौते या व्यापार वार्ता के माध्यम से किया जा सकता है, ताकि दोनों देशों के हितों की रक्षा की जा सके।