अंकिता हत्याकांड के बाद छह महीने में खत्म करना था पटवारी राज, अब भी जारी, आयोग ने मांगा जवाब

देहरादून, 18 फरवरी 2025: उत्तराखंड के सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में पटवारी व्यवस्था की समाप्ति और वहां कानून का राज स्थापित करने के राज्य सरकार के फैसले को अब दो साल से ज्यादा वक्त हो चुका है। लेकिन इन क्षेत्रों में कानून का राज स्थापित करने के लिए की गई कोशिशों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। राज्य सरकार ने पहले चरण में छह नए थाने और 20 पुलिस चौकियां खोली थीं, लेकिन दूसरे चरण की शुरुआत अब तक नहीं हो पाई है। इस देरी को राज्य मानवाधिकार आयोग ने गंभीर रूप से लिया है और शासन से रिपोर्ट की मांग की है।
अंकिता भंडारी हत्याकांड के बाद सरकार की प्रतिक्रिया
अंकिता भंडारी हत्याकांड ने राज्य सरकार को सुदूर क्षेत्रों में कानून की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कदम उठाने पर मजबूर किया था। हत्याकांड के बाद, राज्य सरकार ने पटवारी व्यवस्था समाप्त करने और वहां पुलिस व्यवस्था स्थापित करने के संकेत दिए थे। यह कदम इस बात को ध्यान में रखते हुए उठाया गया था कि सुदूर क्षेत्रों में पटवारी व्यवस्था के तहत स्थानीय दबंगों द्वारा कानून का उल्लंघन किया जाता है और अपराधियों के लिए फरारी काटना आसान हो जाता है। इसके बाद, सरकार ने पुलिस की उपस्थिति बढ़ाने के लिए छह नए थाने और 20 पुलिस चौकियां खोलने का निर्णय लिया था। लेकिन यह कदम अब तक अपेक्षाकृत कम प्रभावी साबित हुआ है, और दूसरे चरण का कार्य पूरा नहीं हो सका है।
राज्य मानवाधिकार आयोग की गंभीर चिंता
राज्य मानवाधिकार आयोग ने इस देरी को बेहद गंभीर माना है। आयोग के सदस्य गिरधर सिंह धर्मशक्तू ने राज्य सरकार से 28 अप्रैल तक आख्या रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में पटवारी व्यवस्था के कारण मानवाधिकारों के उल्लंघन की कई शिकायतों का संज्ञान लिया है। आयोग का कहना है कि इन क्षेत्रों में मानवाधिकारों का हनन इतनी बड़ी मात्रा में हो रहा है, जितना शायद अन्य क्षेत्रों में नहीं होता। स्थानीय दबंगों द्वारा पटवारी को धमकाना आसान हो जाता है, और इस कारण कानून व्यवस्था को ठीक से लागू करने में कठिनाई आती है।
आयोग का यह भी मानना है कि अब राज्य में नए कानून लागू हो चुके हैं, और ऐसे में पटवारी व्यवस्था या राजस्व व्यवस्था के तहत काम करना असंभव हो चुका है। इस संदर्भ में आयोग ने प्रमुख सचिव से आख्या मांगी है, ताकि यह समझा जा सके कि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए क्या कदम उठा रही है।
पटवारी व्यवस्था और कानून का राज
पटवारी व्यवस्था को राज्य में अपराधियों के लिए छिपने का एक ठिकाना माना जा रहा है। बताया गया है कि जब तक पटवारी राज चलता रहेगा, तब तक अन्य अपराधियों के लिए इस व्यवस्था का लाभ उठाना आसान रहेगा। ऐसे क्षेत्रों में, जहां पटवारी का राज है, स्थानीय पुलिस अधिकारियों को राजस्व के मामलों और कानून की जानकारी नहीं होती है। इसके कारण, वे कानून के राज को सही तरीके से लागू नहीं कर पाते, और न ही इन क्षेत्रों में कोई चेकिंग प्वाइंट्स होते हैं।
इसके परिणामस्वरूप, कई कानून व्यवस्था से संबंधित समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। इन समस्याओं में महिलाओं के खिलाफ अपराध, भूमि पर अवैध कब्जे, खनन, तेज रफ्तार गाड़ियों का चलना, स्कूली छात्रों से छेड़छाड़ और शराबियों का हुड़दंग प्रमुख हैं। इन मुद्दों को लेकर सुदूर क्षेत्रों के लोग काफी परेशान हैं, लेकिन राज्य की पुलिस व्यवस्था इन समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही है।
एडवोकेट रितुपर्णा उनियाल की कानूनी प्रतिक्रिया
पटवारी व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाली एडवोकेट रितुपर्णा उनियाल ने राज्य सरकार की कार्रवाई पर कड़ा एतराज जताया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने छह महीने के भीतर राज्य के सुदूर क्षेत्रों में कानून का राज स्थापित करने के लिए हलफनामा दिया था, लेकिन अब दो साल से अधिक वक्त बीतने के बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। इस देरी को लेकर रितुपर्णा उनियाल ने कहा कि सरकार का ढुलमुल रवैया सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना है। इसके तहत, वे अब अवमानना याचिका दाखिल करने का विचार कर रही हैं। उनका मानना है कि राज्य सरकार के वादे और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद कार्रवाई में देरी एक गंभीर कानूनी मुद्दा है।
राज्य सरकार की चुनौतियां और स्थिति
राज्य सरकार के लिए सुदूर क्षेत्रों में कानून व्यवस्था को सुधारने की प्रक्रिया न केवल चुनौतीपूर्ण है, बल्कि यह एक लंबी प्रक्रिया भी बन चुकी है। सरकार को यह समझने की जरूरत है कि पटवारी व्यवस्था के तहत स्थानीय स्तर पर होने वाले कानून उल्लंघनों का समाधान केवल पुलिस के बढ़ते प्रभाव से नहीं हो सकता। इसके लिए एक मजबूत और स्थिर प्रशासनिक ढांचा स्थापित करना होगा, जिसमें न केवल पुलिस बल का सही उपयोग हो, बल्कि स्थानीय जनता के साथ भी संवाद स्थापित किया जाए।
इसके अलावा, नई तकनीकों और मॉडर्न सिस्टम को अपनाकर राज्य सरकार को सुदूर क्षेत्रों में प्रशासनिक सुधार करने होंगे। इसके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय और त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता होगी।
आगे की दिशा
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार और राज्य मानवाधिकार आयोग इस मामले में किस दिशा में काम करते हैं। क्या राज्य सरकार सुदूर क्षेत्रों में कानून का राज स्थापित करने के लिए गंभीर कदम उठाती है, या फिर यह मामला समय की परतों में दबा रह जाता है? राज्य के नागरिकों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि उन्हें एक मजबूत और सुरक्षित प्रशासन मिले, जो उनके अधिकारों की रक्षा कर सके और उनके जीवन को बेहतर बना सके।
उत्तराखंड सरकार के लिए यह समय है कि वह अपनी योजनाओं को तेज करे और सुनिश्चित करे कि सुदूर क्षेत्रों में लोग बिना किसी भय के अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकें। साथ ही, राज्य सरकार को यह भी ध्यान रखना होगा कि कानून का राज केवल शहरों तक सीमित न रह जाए, बल्कि यह हर क्षेत्र में समान रूप से लागू हो।