Uttarakhand

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर्षिल और मुखबा दौरे पर पारंपरिक पहाड़ी परिधान में नजर आएंगे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 मार्च को भारत-चीन सीमा पर स्थित उत्तराखंड के हर्षिल और मुखबा क्षेत्रों के दौरे पर जाने वाले हैं। इस दौरान, वह इस क्षेत्र की पारंपरिक वेशभूषा पहनकर स्थानीय लोगों से जुड़ने का प्रयास करेंगे। उनकी इस पारंपरिक वेशभूषा में भेड़ की ऊन से बनी बादामी और स्लेटी रंग की भेंडी (कोट), साथ ही तिरंगे और ब्रह्मकमल के प्रतीक वाले पहाड़ी टोपी शामिल हैं। यह पहनावा स्थानीय हस्तशिल्पकारों द्वारा विशेष रूप से तैयार किया गया है।

हर्षिल और मुखबा दौरे की खासियत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क्षेत्रीय दौरे हमेशा से ही चर्चा का विषय रहे हैं। उनके द्वारा पहनी जाने वाली परिधानों को अक्सर स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। पीएम मोदी के हर्षिल और मुखबा दौरे के दौरान भी यह बात बिल्कुल सही साबित होने वाली है। इस बार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन क्षेत्रों की पारंपरिक वेशभूषा पहनेंगे, जो स्थानीय कारीगरी और परंपरा का आदान-प्रदान करेगा।

उत्तरकाशी की पारंपरिक वेशभूषा: भेड़ की ऊन से बनी भेंडी

उत्तरकाशी की पारंपरिक वेशभूषा को ध्यान में रखते हुए, प्रधानमंत्री मोदी के लिए भेड़ की ऊन से बनी भेंडी (कोट) तैयार की गई है। यह भेंडी पारंपरिक रूप से बादामी और स्लेटी रंग में तैयार की गई हैं, जो उत्तरकाशी क्षेत्र के सांस्कृतिक रंगों को दर्शाती हैं। इस परिधान को तैयार करने में विशेष ध्यान दिया गया है, ताकि यह न केवल दिखने में आकर्षक हो, बल्कि पहनने में भी आरामदायक हो। भेड़ की ऊन का प्रयोग विशेष रूप से स्थानीय शिल्पकला और हस्तशिल्प का हिस्सा है।

पजामा और टोपी भी विशेष रूप से तैयार

इसके अलावा, पीएम मोदी के लिए सफेद रंग के दो पजामे भी तैयार किए गए हैं, जो इस पारंपरिक परिधान के साथ पूरी तरह से मेल खाते हैं। इसके साथ ही, पहाड़ी टोपी भी तैयार की गई है, जो भेड़ी के रंग के अनुरूप है। यह टोपी न केवल पहाड़ी संस्कृति का प्रतीक है, बल्कि इसमें तिरंगे के केसरी, हरी और सफेद रंग की पट्टी के साथ लाल रंग की पट्टी भी जुड़ी है, जो भारतीय शक्ति और बल का प्रतीक है। इसके साथ ही ब्रह्मकमल का डिज़ाइन भी इस टोपी पर उकेरा गया है, जो उत्तरकाशी के पहाड़ी इलाकों में पाई जाने वाली एक विशेष फूल प्रजाति है।

परिधान तैयार करने में स्थानीय महिलाओं का योगदान

इस विशेष पहाड़ी परिधान को तैयार करने में उत्तरकाशी की महिलाओं का अहम योगदान है। यह परिधान वीरपुर डुंडा नालंदा एसएचजी महिला स्वयं सहायता समूह की भागीरथी नेगी द्वारा तैयार किया गया है। भागीरथी नेगी ने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया में भेड़ की ऊन का हाथ से कताई करके परिधान तैयार किया गया है। यह परिधान किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थों से मुक्त है, जिससे यह न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि पहनने में भी पूरी तरह से आरामदायक है।

इसके अलावा, इस परिधान की सिलाई सुरेंद्र नैथानी ने की है, जो एक स्थानीय कारीगर हैं। भागीरथी नेगी ने बताया कि यह परिधान दस दिन के भीतर तैयार किया गया है, जो स्थानीय कारीगरी की क्षमता और गुणवत्ता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि यह परिधान पूरी तरह से हस्तशिल्प द्वारा तैयार किया गया है, जो स्थानीय संस्कृति और परंपराओं की सजीव उदाहरण है।

पीएम मोदी के दौरे का उद्देश्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दौरा उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों की स्थिति और विकास की योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करने के लिए है। हर्षिल और मुखबा जैसे क्षेत्र भारत-चीन सीमा के पास स्थित हैं, जहां सुरक्षा के दृष्टिकोण से कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर काम करने की आवश्यकता है। इस दौरे के दौरान, प्रधानमंत्री मोदी इन क्षेत्रों में विकास कार्यों को गति देने के अलावा, स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को भी बढ़ावा देंगे।

इसके साथ ही, पीएम मोदी के इस दौरे का एक प्रमुख उद्देश्य स्थानीय लोगों के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव स्थापित करना है। प्रधानमंत्री मोदी जब भी देश या विदेश के किसी विशेष स्थान पर जाते हैं, तो वहां की पारंपरिक वेशभूषा पहनकर स्थानीय संस्कृति और जनता के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करते हैं। यह पहल न केवल भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देती है, बल्कि इससे स्थानीय कारीगरों को भी प्रोत्साहन मिलता है।

भारतीय हस्तशिल्प और कारीगरी का सम्मान

प्रधानमंत्री मोदी का यह कदम भारतीय हस्तशिल्प और कारीगरी के प्रति सम्मान का प्रतीक है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय शिल्पकला और कारीगरी एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इस परिधान का डिजाइन और तैयार करना यह दर्शाता है कि स्थानीय कारीगरी को पहचान और समर्थन मिल रहा है, जिससे न केवल स्थानीय उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि यह पारंपरिक शिल्पकला को भी संरक्षित किया जाएगा।

उत्तरकाशी और हर्षिल जैसे क्षेत्रों में जब पारंपरिक वस्त्रों की बात होती है, तो इनकी विशेषता केवल सौंदर्य में नहीं बल्कि कार्यकुशलता में भी निहित होती है। पारंपरिक ऊन के कपड़े, भेड़ी से बने परिधान, और पहाड़ी टोपी क्षेत्र की संस्कृति का जीवित उदाहरण हैं। इनका सम्मान करना और इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित करना भारतीय संस्कृति और कारीगरी के संरक्षण के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

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