चारधाम मार्ग पर 42 स्थानों पर भूस्खलन का खतरा, इसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

चारधाम यात्रा, जो उत्तराखंड में स्थित चार प्रमुख तीर्थ स्थलों – यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ – तक जाने वाले मार्गों पर आधारित है, अब एक नई चुनौती का सामना कर रही है। यह चुनौती है भूस्खलन की समस्या, जो न केवल यात्रियों की सुरक्षा के लिए खतरा है, बल्कि इस मार्ग के निर्माण और चौड़ीकरण की योजनाओं को भी प्रभावित कर रही है। खासतौर पर राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) के अधीन आने वाले चारधाम मार्ग पर 42 ऐसे स्थान चिह्नित किए गए हैं, जहां भूस्खलन की समस्या उत्पन्न हो रही है।
एनएच के अधिकारियों का कहना है कि इन समस्याओं के समाधान के लिए कार्य चल रहा है, लेकिन इनका स्थायी समाधान अगले एक साल में ही संभव हो सकेगा। एनएच के मुख्य अभियंता दयानंद ने बताया कि चारधाम मार्ग के तहत एनएच के पास सड़कें हैं, जिनमें 42 स्थानों पर भूस्खलन की समस्या आ रही है। इसके अलावा, सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के अधीन आने वाली सड़कें भी इससे प्रभावित हैं, जहां करीब 25 स्थानों पर भूस्खलन की समस्या सामने आई है।
मार्ग के चौड़ीकरण के साथ यात्रा हुई सुगम
चारधाम मार्ग के चौड़ीकरण कार्य को लेकर पिछले कुछ वर्षों में काफी प्रगति हुई है। मार्ग का चौड़ीकरण किया गया है, जिससे यात्रा सुगम हो गई है और यात्री समय की बचत कर पा रहे हैं। चौड़ीकरण के कारण, विशेषकर तीर्थयात्रियों को यात्रा के दौरान अधिक समय नहीं लगता है और मार्ग की क्षमता में भी वृद्धि हुई है।
हालांकि, चौड़ीकरण से मार्ग की समस्याएं कुछ हद तक कम हुईं हैं, लेकिन भूस्खलन का खतरा अब भी बना हुआ है। कई स्थानों पर, जहां पहाड़ी क्षेत्र और पत्थरीले इलाके हैं, भूस्खलन की घटनाएं लगातार हो रही हैं। यह समस्या विशेषकर मानसून के दौरान और भी विकराल हो जाती है, जब बारिश के कारण पहाड़ों से मलबा गिरता है और मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।
समाधान की दिशा में एनएच और बीआरओ का प्रयास
एनएच अधिकारियों का कहना है कि भूस्खलन की समस्या से निपटने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। एनएच के अंतर्गत आने वाले 42 स्थानों पर भूस्खलन की समस्या को लेकर काम जारी है। दयानंद ने बताया कि इनमें से 39 स्थानों पर कार्य तेजी से चल रहा है, जबकि तीन स्थानों पर जल्द ही प्रस्ताव तैयार कर लिया जाएगा। यह काम मुख्य रूप से भूस्खलन को नियंत्रित करने और मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है।
बीआरओ द्वारा भी अपने अधीन आने वाले मार्गों पर इस समस्या का समाधान किया जा रहा है। उनकी टीम भी भूस्खलन के संभावित स्थानों की पहचान कर वहां दीवारें, सुरंगें और अन्य संरचनाएं बना रही है ताकि पहाड़ी ढलानों से मलबा गिरने से मार्ग पर कोई बाधा न आए।
एनएच और बीआरओ की टीमों द्वारा किए जा रहे प्रयासों से उम्मीद जताई जा रही है कि अगले साल जून तक सभी स्थानों पर भूस्खलन की समस्या का समाधान कर लिया जाएगा। इस कार्य के लिए लगभग डेढ़ हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे, जो कि इसे एक महत्वपूर्ण और महात्वाकांक्षी परियोजना बना देता है।
भूस्खलन की समस्या और उसका प्रभाव
भूस्खलन केवल यात्री सुरक्षा के लिए खतरे की बात नहीं है, बल्कि यह मार्ग के सामान्य संचालन को भी प्रभावित करता है। कई बार भूस्खलन के कारण मार्ग पूरी तरह से अवरुद्ध हो जाता है, जिससे यात्री फंसे रहते हैं और उन्हें समय पर गंतव्य तक पहुंचने में समस्या आती है। यह न केवल तीर्थयात्रियों के लिए मुश्किल है, बल्कि स्थानीय निवासियों और व्यापारियों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जो इस मार्ग पर निर्भर रहते हैं।
भूस्खलन के कारण यात्रा में देरी, दुर्घटनाएं और अन्य कई खतरों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, भूस्खलन के कारण जो मलबा सड़क पर गिरता है, वह आसपास के इलाकों के लिए भी खतरा बन सकता है, क्योंकि इससे स्थानीय जलस्रोत, खेत और अन्य महत्वपूर्ण संरचनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
भूस्खलन की चुनौती और सरकार की प्राथमिकता
उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही चारधाम मार्ग की सुरक्षा और विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं। सरकार इस मार्ग के सुगम और सुरक्षित संचालन के लिए लगातार प्रयास कर रही है, ताकि तीर्थयात्रियों को कोई कठिनाई न हो। चारधाम यात्रा उत्तराखंड की आर्थ
िक गतिविधियों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है, और इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि मार्ग पर किसी भी प्रकार का अवरोध न आए।
सरकार का ध्यान न केवल भूस्खलन की समस्या पर है, बल्कि इस मार्ग के चौड़ीकरण और संरचनाओं की मजबूती पर भी है। आने वाले समय में, इन प्रयासों से उम्मीद जताई जा रही है कि चारधाम मार्ग अधिक सुरक्षित, सुगम और समय की बचत करने वाला बनेगा।